Monday, December 31, 2012

अब दर्श दिखाओ कान्हा

जय श्री कृष्णा

माखन छोड़ चक्र उठाओ कान्हा

आज वक़्त है दुष्टों के संहार का

अब देर न लगाओ कान्हा

नव वर्ष में सब सुखी हों

सब तुम पर है कान्हा

आज दुनिया फिर से संकट में है

तुम दर्श दिखाओ कान्हा

सब का नया वर्ष सुखमय बनाओ कान्हा

अब देर ना लगाओ

दर्श दिखाओ कान्हा

Thursday, December 20, 2012

जय माता की

माँ

जय माता की

दुष्ट संघारनी

 

Monday, October 29, 2012

करवाचौथ व्रत की विधि और कथा

करवा माता 
करवाचौथ व्रत की विधि 
करवाचौथ व्रत की कथा

करवा माता सब सुहागनों के सुहाग

सदा  बनाए रखे

जय करवा माता की 

Saturday, September 15, 2012

जय माँ

जय माँ

खाली झोली भर देती है 

आशा पूर्ण कर देती है 


एक आवाज़ लगाओ माँ को 


माँ दौड़ी चली आती है 


सब भक्तो का विश्वास है


बस माँ तेरी ही  आस है .....




जय माता की 

Monday, September 3, 2012

महालक्ष्मी व्रत विधि और कथा

महा लक्ष्मी
है.

श्री महालक्ष्मी व्रत विधि

सबसे पहले प्रात:काल में स्नान आदि कार्यो से निवृ्त होकर, व्रत का संकल्प लिया जाता है. व्रत का संकल्प लेते समय निम्न मंत्र का उच्चारण किया जाता है.

करिष्यsहं महालक्ष्मि व्रतमें त्वत्परायणा ।

तदविध्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत: ।।

अर्थात हे देवी, मैं आपकी सेवा में तत्पर होकर आपके इस महाव्रत का पालन करूंगा. आपकी कृ्पा से यह व्रत बिना विध्नों के पर्रिपूर्ण हों, ऎसी कृ्पा करें.
यह कहकर अपने हाथ की कलाई में बना हुआ डोरा बांध लें, जिसमें 16 गांठे लगी हों, बाध लेना चाहिए. प्रतिदिन आश्चिन मास की क्रिशंपक्ष  की अष्टमी तक यह व्रत किया जाता है. और पूजा की जाती है. व्रत पूरा हो जाने पर वस्त्र से एक मंडप बनाया जाता है. उसमें लक्ष्मी जी की प्रतिमा रखी जाती है.
श्री लक्ष्मी को पंचामृ्त से स्नान कराया जाता है. और फिर उसका सोलह प्रकार से पूजन किया जाता है. इसके बाद व्रत करने वाले उपवासक को ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है. और दान- दक्षिणा दी जाती है.
पूजन सामग्री में चन्दन, ताल, पत्र, पुष्प माला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल तथा नाना प्रकार के भोग रखे जाते है. नये सूत 16-16 की संख्या में 16 बार रखा जाता है. इसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण किया जाता है.

क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्र सहोदरा ।

व्रतोनानेत सन्तुष्टा भवताद्विष्णुबल्लभा ।।

अर्थात क्षीर सागर से प्रकट हुई लक्ष्मी जी, चन्दमा की सहोदर, श्री विष्णु वल्लभा, महालक्ष्मी इस व्रत से संतुष्ट हो. इसके बाद चार ब्राह्माण और 16 ब्राह्माणियों को भोजन करना चाहिए. इस प्रकार यह व्रत पूरा होता है. इस प्रकार जो इस व्रत को करता है, उसे अष्ट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है.
16वें दिन इस व्रत का उद्धयापन किया जाता है. जो व्यक्ति किसी कारण से इस व्रत को 16 दिनों तक न कर पायें, वह 3 दिन तक भी इस व्रत को कर सकता है. व्रत के तीन दोनों में प्रथम दिन, व्रत का आंठवा दिन व व्रत के 16वें दिन का प्रयोग किया जा सकता है. इस व्रत को लगातार 16वर्षों तक करने से विशेष शुभ फल प्राप्त होते है. इस व्रत में अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए. केवल फल, दूध, मिठाई का सेवन किया जा सकता है.

महालक्ष्मी व्रत कथा 

प्राचीन समय की बात है, कि एक बार एक गांव में एक गरीब ब्राह्माण रहता था. वह ब्राह्माण नियमित रुप से श्री विष्णु का पूजन किया करता था. उसकी पूजा-भक्ति से प्रसन्न होकर उसे भगवान श्री विष्णु ने दर्शन दिये़. और ब्राह्माण से अपनी मनोकामना मांगने के लिये कहा, ब्राह्माण ने लक्ष्मी जी का निवास अपने घर में होने की इच्छा जाहिर की. यह सुनकर श्री विष्णु जी ने लक्ष्मी जी की प्राप्ति का मार्ग ब्राह्माण को बता दिया, मंदिर के सामने एक स्त्री आती है,जो यहां आकर उपले थापती है, तुम उसे अपने घर आने का आमंत्रण देना. वह स्त्री ही देवी लक्ष्मी है.
देवी लक्ष्मी जी के तुम्हारे घर आने के बार तुम्हारा घर धन और धान्य से भर जायेगा. यह कहकर श्री विष्णु जी चले गये. अगले दिन वह सुबह चार बचए ही वह मंदिर के सामने बैठ गया. लक्ष्मी जी उपले थापने के लिये आईं, तो ब्राह्माण ने उनसे अपने घर आने का निवेदन किया. ब्राह्माण की बात सुनकर लक्ष्मी जी समझ गई, कि यह सब विष्णु जी के कहने से हुआ है. लक्ष्मी जी ने ब्राह्माण से कहा की तुम महालक्ष्मी व्रत करो, 16 दिनों तक व्रत करने और सोलहवें दिन रात्रि को चन्द्रमा को अर्ध्य देने से तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा.
ब्राह्माण ने देवी के कहे अनुसार व्रत और पूजन किया और देवी को उत्तर दिशा की ओर मुंह् करके पुकारा, लक्ष्मी जी ने अपना वचन पूरा किया. उस दिन से यह व्रत इस दिन, उपरोक्त विधि से पूरी श्रद्वा से किया जाता है.  
जय माँ महालक्ष्मी
२३ तारीख से व्रत आरम्भ हैं ....

Thursday, August 30, 2012

जय संतोषी माता

जय संतोषी माँ


माँ भगवती हर स्थान पर ,तेरे नाम का उजियारा है
तेरे नाम की छैया में ,मैंने पाया प्यार तुम्हारा है

संतोष सिखाती है तू ,हर काज तूने मेरा संवारा है
तेरे बिन माँ संतोषी ,मेरा इस जग में कहाँ गुजारा है

जय जय माँ संतोषी ,मेरे लब पर तेरा ही जयकारा है
जय जय माँ संतोषी ,मेरे लब पर तेरा ही जयकारा है


जय जय संतोषी माँ ,बस तर ही सहारा है जेकर है 

जय जय संतोषी माँ ,सब के दुखो को हरनेवाली 

जी जय संतोषी माँ ,बस अब तेरा ही सहारा है 

संकट दूर करो माँ अम्बे 

अपने वचन निभाओ माँ अम्बे 

आज झोली खली ले कर आई हूँ 

बार दे झोली ,खली झोली न जाने देना 

एक तेरा सहारा है तू ही पार लगाना माता 

======जय संतोषी माता======

जय सत्यनारायण स्वामी

जय लक्ष्मी रमना


जय लक्ष्मी रमणा श्री जय लक्ष्मी रमणा

सतनारायण स्वामी जनपातक हरना .

रतन जनित सिन्हासन ,अदभुत छवि राजे ,

नारद करद निरंतर ,घंटा ध्वनि बाजे ,

प्रकट भये कलिकारण ,द्विज को दरस दिए ,

बड़ा ब्राह्मण बंकर कंचन महल कियो

जय लक्ष्मी रमण

..............ओम् .............



Saturday, August 25, 2012

आज के राम बनो

जय श्री राम

राम का नाम लो मन से

मर्यादा पुर्शोतम नहीं बन सकते तो

एक अछे इंसान बनो

भाई और पत्नी का आदर करो

माता पिता के आज्ञाकारी बनो

आज की दुनिया में

जिसने इतना कर लिया

उसने राम को पा लिया

........जय श्री राम .......

Thursday, August 23, 2012

राम का नाम

राम

मन परेशान हो

बस राम का नाम लो

राम नाम हर दुःख हरता है

आत्मा को शीतल करता है

बोलो

राम राम राम राम राम

........जय श्री राम .......

Monday, August 20, 2012

जय हो

जय हो

संकट मोचन संकट दूर करो सब के

मन को साफ़ करो और सच्चाई भरो सब में

जो तेरा नाम धियावे

भुत पिसाच ताके निकट न आवे

स्वार्थ भरे भूतो को भगाओ

अपने भक्तो को बचाओ

जय बजरंग बलि 
‎_/\_ मारुति नंदन नमो नमः _/\_ कष्ट भंजन नमो नमः _/\_



_/\_ असुर निकंदन नमो नमः _/\_ श्रीरामदूतम नमो नमः _/\_

Sunday, August 19, 2012

जय शिव

शिव

जिसने नाम लिया शिव का

उसका बेडा पार हुआ

जिसने पूजा की शिव की

उसको हर खुशी मिली जीवन की

प्रेम से लो शिव का नाम

पूर्ण होंगे सारे काम

..........जय शिव ओमकारा .......

........शिव ही शिव .........

Saturday, August 18, 2012

जय देव

जय देव

सुखकरता दुखहर्ता


वार्ता विघनाची


नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची


सर्वांगी सुन्दर उटीशेंदुराची


कंठी झलके माळ मुकता फलांचि


जय देव जय देव


जय मंगल मूर्ति


दर्शन मरते मान कामना पूर्ति


जय देव जय देव


रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा


चंदनाची उटी कुमकुम केशरा


हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा


रुनझुनती नूपुरे चरनी घागरिया


जय देव जय देव


जय मंगल मूर्ति


दर्शन मरते मान कामना पूर्ति


जय देव जय देव


लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदना


सरल सोन्ड वक्रतुंड त्रिनयना


दास रामाचा वाट पाहे सदना


संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवर वंदना


जय देव जय देव


जय मंगल मूर्ति


दर्शन मरते मान कामना पूर्ति


जय देव जय देव...!!!

जय माँ शेरावाली

जय माँ

|| सारे आलम में बढ़कर है माँ शेरावाली का दरबार ||

सारे आलम में बढ़कर है , माँ शेरावाली का दरबार |
एक बार जो पहुँच गया , वो आना चाहे बारम्बार ||

यहाँ ठिकाना मिलता है , हर एक आने वाले को |
मैया भी देती हैं आदर , हर एक बुलाने वाले को ||
इसीलिए सारे ब्रह्माण्ड में, होता है माँ का जयकार |
सारे आलम में बढ़कर है , माँ शेरावाली का दरबार ||

नजरो के एक इशारे से , यहाँ झोली भर दी जाती है |
नहीं जरूरत है कहने की , सूरत ही पढ़ ली जाती है ||
किसी को मिले संतान , किसी को दौलत का अम्बार |
सारे आलम में बढ़कर है , माँ शेरावाली का दरबार ||

‘श्याम’ बना यहाँ बंसीवाला , राम भी बना धनुधारी |
विष्णु को मिला चक्र सुदर्शन , भोले बन गए भंडारी ||
मंगता नहीं बना इस दर कोई , माँ ऐसा तेरा प्यार |
सारे आलम में बढ़कर है , माँ शेरावाली का दरबार ||

जय माँ शेरा वाली

Sunday, August 12, 2012

ओम् ....

ओम्


ओ3म् का उच्चारण है चमत्कारिक !!

* मृत कोशिकाएँ जीवित हो जाती है * नकारात्मक भाव बदलकर सकारात्मक हो जाते है |
* स्टिरोइड का स्तर कम हो जाता है | * तनाव से मुक्ति मिलती है | * चेहरे के भावों (फेसीयल एक्स्प्रेसन) को भी बदल डालता है | * हमारे आस पासके वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है |
* मस्तिष्क में परिवर्तन होता है और स्वस्थ हो जाता है।* पेट की तकलीफ दूर हो जाती है |
* मस्तिष्क व हृदय की कमजोरी यह सब दूर होता है।
आदि अनंत लाभ होते है ,ओ3म् का उच्चारण करते जाये और रहस्य खोलते जाये |
 — 

Thursday, August 9, 2012

जन्माष्टमी की शुभ कामनाये

कृष्ण

श्री कृष्ण ने कहा है की मेने जो बात कही है गीता में वोह हर युग में अलग रूप से ही प्रगट होगी यदिमें न भी आऊ तो भी यह मेरा प्रकाश फेलाती रहेगी |

सब को जन्माष्टमी की शुभ कामनाये


Wednesday, August 8, 2012

जन्माष्टमी

कृष्णा


श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें ....




स्मार्त मत : ९ अगस्त गुरूवार, सप्तमी योगे अर्धरात्रि को अष्टमी व्याप्त होगी..




वैष्णव मत : १० अगस्त, शुक्रवार, अष्टमी उदय व्यापिनी दोपहर १:४२ तक होगी...




कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत सनातन-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य माना गया है। साधारणतया इस व्रत के विषय में दो मत हैं ।





 स्मार्त लोग अर्धरात्रि स्पर्श होने पर या रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी में भी उपवास करते हैं..





. और वैष्णव लोग सप्तमी का किन्चिन मात्र स्पर्श होनेपर द्वितीय दिवस है 



ी उपवास करते हैं | वैष्णवों में उदयाव्यपिनी अष्टमी एवं रोहिणी नक्षत्र को ही मान्यता एवं प्रधानता दी जाती हैं |

जब भी असुरों के अत्याचार बढ़े हैं और धर्म का पतन हुआ है तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। इसी कड़ी में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि के अभिजित मुहूर्त में अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया। एक ऐसा अवतार जिसके दर्शन मात्र से प्राणियो के, घट घट के संताप, दुःख, पाप मिट जाते है | जिन्होंने इस श्रृष्टि को गीता का उपदेश दे कर उसका कल्याण किया, जिसने अर्जुन को कर्म का सिद्धांत पढाया, यह उनका जन्मोत्सव है |




हमारे वेदों में चार रात्रियों का विशेष महातम्य बताया गया है...



1) दीपावली जिसे कालरात्रि कहते है...



2) शिवरात्रि महारात्रि है...



3) श्री कृष्ण जन्माष्टमी मोहरात्रि और



4) होली अहोरात्रि है...

जिनके जन्म के सैंयोग मात्र से बंदी गृह के सभी बंधन स्वत: ही खुल गए, सभी पहरेदार घोर निद्रा में चले गए, माँ यमुना जिनके चरण स्पर्श करने को आतुर हो उठी, उस भगवान श्री कृष्ण को सम्पूर्ण श्रृष्टि को मोह लेने वाला अवतार माना गया है | इसी कारण वश जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। | इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है।




*** अष्टमी दो प्रकार की है- पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती... इसमें केवल पहली अष्टमी है... यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो 'जयंती' नाम से संबोधित की जाएगी...




*** "वह्निपुराण" का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको "जयंती" नाम से ही संबोधित किया जाएगा | अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए...

*** "विष्णुरहस्यादि" वचन से- कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नाम वाली ही कही जाएगी...

*** "वसिष्ठ संहिता" का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए...

*** "स्कन्द पुराण" का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं... उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है... इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं...

योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। ब्रजमंडल में श्री कृष्णाष्टमी "नंद-महोत्सव" अर्थात् "दधिकांदौ श्रीकृष्ण" के जन्म उत्सव का दृश्य बड़ा ही दुर्लभ होता है | भगवान के श्रीविग्रह पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढा ब्रजवासी उसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं तथा छप्पन भोग का महाभोग लगते है। वाद्ययंत्रों से मंगल ध्वनि बजाई जाती है। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है। सम्पूर्ण ब्रजमंडल "नन्द के आनंद भयो... जय कन्हैय्या लाल की"... जैसे जयघोषो व बधाइयो से गुंजायमान होता है...




व्रत महात्यम:-




जन्माष्टमी का व्रत "व्रतराज" कहा गया है... इसके सविधि पालन से प्राणी अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्य राशि प्राप्त कर सकते है...




"भविष्य पुराण" के जन्माष्टमी व्रत-माहात्म्य में यह कहा गया है कि जिस राष्ट्र या प्रदेश में यह व्रतोत्सव किया जाता है, वहां पर प्राकृतिक प्रकोप या महामारी का ताण्डव नहीं होता। मेघ पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा फसल खूब होती है। जनता सुख-समृद्धि प्राप्त करती है। इस व्रतराज के अनुष्ठान से सभी को परम श्रेय की प्राप्ति होती है। व्रतकर्ता भगवत्कृपा का भागी बनकर इस लोक में सब सुख भोगता है और अन्त में वैकुंठ जाता है।

कृष्णाष्टमी का व्रत करने वाले के सब क्लेश दूर हो जाते हैं।दुख-दरिद्रता से उद्धार होता है। गृहस्थों को पूर्वोक्त द्वादशाक्षर मंत्र से दूसरे दिन प्रात:हवन करके व्रत का पारण करना चाहिए। जिन भी लोगो को संतान न हो, वंश वृद्धि न हो, पितृ दोष से पीड़ित हो, जन्मकुंडली में कई सारे दुर्गुण, दुर्योग हो, शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाले को एक सुयोग्य,संस्कारी,दिव्य संतान की प्राप्ति होती है, कुंडली के सारे दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल जाते है और उनके पितरो को नारायण स्वयं अपने हाथो से जल दे के मुक्तिधाम प्रदान करते है |

"स्कन्द पुराण" के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है।

"ब्रह्मपुराण" का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें।

केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। जिन परिवारों में कलह-क्लेश के कारण अशांति का वातावरण हो, वहां घर के लोग जन्माष्टमी का व्रत करने के साथ निम्न किसी भी मंत्र का अधिकाधिक जप करें-

"ॐ नमो नारायनाय "

आथवा

" सिद्धार्थ: सिद्ध संकल्प: सिद्धिद सिद्धि: साधन:"

आथवा

"ॐ नमों भगवते वासुदेवाय"

या

"श्री कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नम:"॥

आथवा

"श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवाय" ||

उसके पश्चात सभी परिजनों में प्रसाद वितरण कर सपरिवार अन्न भोजन ग्रहण करे और यदि संभव हो तो रात्रि जागरण करना विशेष लाभ प्रद सिद्ध होता है जो किसी भी जीव की सम्पूर्ण मनोकामना पूर्ति करता है...

इसके आलावा कृष्ण जन्म के समय "राम चरित मानस" के"बालकांड" में "रामजन्म प्रसंग" का पाठ आथवा "विष्णु सहस्त्रनाम" , "पुरुष सूक्त" का पाठ भी सर्वस्य सिद्दी व सभी मनोरथ पूर्ण करने वाला है...

इस "संतान गोपाल मंत्र", के जाप व "हरिवंश पुराण", "गीता" के पाठ का भी बड़ा ही महत्व्य है |यह तिथि तंत्र साधको के लिए भी बहु प्रतीक्षित होती है, इस तिथि में "सम्मोहन" के प्रयोग सबसे ज्यादा सिद्ध किये जाते है | यदि कोई सगा सम्बन्धी रूठ जाये, नाराज़ हो जाये, सम्बन्ध विच्छेद हो जाये,घर से भाग जाये, खो जाये तो इस दिन उन्हें वापिस बुलाने का प्रयोग अथवा बिगड़े संबंधो को मधुर करने का प्रयोग भी खूब किया जाता है |

जय श्री कृष्ण.

Monday, August 6, 2012

जय हनुमान

जय हनुमान

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर
जय कपीस तिहूँ लोक उजागर

राम राम राम राम राम राम राम राम

राम रा राम राम राम राम राम राम

राम

राम दूत अतुलित बलधामा
अंजनी पुत्र पवन सूत नामा

महावीर विक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी

राम राम राम
राम

Friday, August 3, 2012

तीज

हे शिव आज सभी सुहागनो के मन की जरुर सुनना

सब को अखंड सौभाग्य का आशीष जरुर देना

तीज की शुभ कामनाये देना

तुझ पर सब की  आस्था है लाज रखना

किसी भूल की और मत देखना

सब के प्यार को समझना 
तीज

सब को तीज की हार्दिक शुभ कामनाये 

Thursday, August 2, 2012

जय संतोषी माता

संतोषी माता

जय संतोषी माता
बिछड़ों को  मिलाने वाली
सुख संपत्ति दाता

Monday, July 30, 2012

जय हनुमान

जय हनुमान

श्री गुरु चरण सरोज रज ,निज मन मुकुर सुधारि
बरनऊ रघुवर विमल जसु,जो दायक फल चारि
बुद्धिहीन तनु जानि के ,सुमिरो पवन कुमार
बल बुधि विद्या देऊ  मोहि ,हरहु क्लेश विकार 

शिवाये नम'

शिव

ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम |


उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्युर्मुक्षियाय मामृतात ||


ॐ नमः शिवाय शिवायै नमः ॐ !!!

Sunday, July 29, 2012

भोलेनाथ

शिव

| छोड़े आज चरण भोले के , तो कभी पकड़ न पाओगे ||

छोड़े आज चरण भोले के , तो कभी पकड़ न पाओगे |
ऐसी वैसी भूल नहीं ये , तुम जीवन भर पछताओगे ||

इस जीवन में ऐसे मौके , भक्तो बार-बार नहीं आते है |
समय को जो पहचान न पाए , वो ही कष्ट उठाते है ||
सीधा रास्ता छोड़ दिया तो , तुम दर पे कैसे आओगे |
छोड़े आज चरण भोले के , तो कभी पकड़ न पाओगे ||

जहाँ सब का मान बराबर हो , ऐसा स्थान कहाँ होगा |
भोलेबाबा से बढ़ कर भक्तो , दूजा भगवान कहाँ होगा ||
हाथ से मौका गंवा दिया तो , तुम सुकूँ कैसे पाओगे |
छोड़े आज चरण भोले के , तो कभी पकड़ न पाओगे ||

‘श्याम’ बड़ा अच्छा मौका है , तु जाकर इसे अजमाले |
मन को बड़ा सुकूँ मिलेगा , गर दर पे हाजिरी लगवाले ||
आज कसाला कर लोगे तो , जन्म-जन्म सुख पाओगे |
छोड़े आज चरण भोले के , तो कभी पकड़ न पाओगे ||

जय शिव भोलेनाथ 

Saturday, July 28, 2012

जय दुर्गे

जय माता की

जय माँ जय जय माँ
..
सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोsस्तु ते ॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।

सर्वस्यार्तिहरे देवी नारायणि नमोsस्तु ते ॥

सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।

भयेभ्यस्त्राहि नो देवी दुर्गे देवी नमोsस्तु ते ||

ॐ श्री दुर्गाय नमः


जय श्री कृष्ण

जय श्री कृष्ण

जय श्री कृष्ण -जय श्री कृष्ण -

जय श्री कृष्ण

-जय श्री कृष्ण
-
जय श्री कृष्ण

-जय श्री कृष्ण
 -
जय श्री कृष्ण

 -राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे

जय श्री कृष्ण

जय श्री कृष्ण


-जय श्री कृष्ण

-जय श्री कृष्ण

शिव शिव

शिव

जिस प्रकार एक ही सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है । यह शरीर ही क्षेत्र है और इसको जो भली प्रकार जानता है, वह क्षेत्रज्ञ है । वह उसमेँ फँसा नहीँ है बल्कि उसका संचालक है ।
जय भोलेनाथ सदाशिव शंकर
शिव ! शिव !!

कृष्णा

कृष्णा

|| जानना चाहो गर ‘कृष्णा ’ के प्यार को ||

जानना चाहो गर ‘कृष्णा ’ के प्यार को |
मन से झांक लो तुम राधा के हार को ||

बिन कसाले के हर राज़ ही खुल जाएगा |
तुम्हे तब आशीष दोनों का मिल जाएगा ||
रखना आँखे खुली तब दोनों के दीदार को |
जानना चाहो गर ‘कृष्णा ’ के प्यार को ||

कमी कोई भी तुमको नही होगी कभी |
जो भी मांगोगे मिल जाएगा वो तभी ||
जोड़े रखना सभी को होगा उनसे तार को |
जानना चाहो गर ‘कृष्णा ’ के प्यार को ||

मन है उनका दिया तन उन्ही का दिया |
जो भी पास तेरे सब है उन्ही का दिया ||
रखना सुरक्षित उनके सभी उपहार को |
जानना चाहो गर ‘कृष्णा  ’ के प्यार को ||

जय श्री कृष्णा

Friday, July 27, 2012

शिव

शिव

शि' का अर्थ है पापों का नाश करने वाला और 'व' कहते हैं मुक्ति देने वाले को। भोलेनाथ में ये दोनों गुण हैं इसलिए वे शिव कहलाते हैं।

शिव भक्तों का सर्वाधिक लोग प्रिय मंत्र है "ॐ नमः शिवाय"।

नमः शिवाय अर्थात शिव जी को नमस्कार
पाँच अक्षर का मंत्र है "न", "म", "शि", "व" और "य" ।
प्रस्तुत मंत्र इन्ही पाँच अक्षरों की व्याख्या करता है। स्तोत्र के पाँच छंद पाँच अक्षरों की व्याख्या करते हैं।
अतः यह स्तोत्र पंचाक्षर स्तोत्र कहलाता है। "ॐ" के प्रयोग से यह मंत्र छः अक्षर का हो जाता है।
एक दूसरा स्तोत्र "शिव षडक्षर स्तोत्र इन छः अक्षरों पर आधारित है|

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय|
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥

वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय|
दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ|
शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

!!!۞!!! ॐ नम: शिवाय !!!۞!!

जय अम्बे

अम्बे माँ

जय माँ अम्बे जय जय माँ अम्बे
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सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोsस्तु ते ॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।

सर्वस्यार्तिहरे देवी नारायणि नमोsस्तु ते ॥

सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते

भयेभ्यस्त्राहि नो देवी दुर्गे देवी नमोsस्तु ते ||

जय माँ अम्बे

जय माँ अम्बे





जय गणेश

गणपति
हे गणेश देव !
खिलते हुए जपा पुष्प, रत्न, पुष्प मूँगा और प्रभात की लालिमा, इन सबोँ की ज्योति के समुच्चयवाले, लम्बोदर, वक्रतुण्ड, एकदन्त, गणोँ के स्वामी, शिवसुत श्रीगणेश जी की स्तुति करता हूँ ।
वक्रतुण्ड वाली महा काया को धारण करने वाले, करोड़ोँ सूर्यो के समान कान्ति वाले, हे गणेश देव ! मेरे सारे कार्योँ के विघ्नोँ को सदा के लिये दूर करो ।
जय गणेश देवा
जय गणेश देवा

गणपति बाप्पा मोरया

जय शिव

ओम्

सावन के महीने में भगवान शिव धरती पर भ्रमण पर आते हैं
कहते हैं सावन के महीने में स्वयं भगवान शिव पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं। इसलिए इस विशेष महीने में भक्तगण शिव की पूजा-अर्चना में रम जाते हैं। आइए, हम उनके विभिन्न नामों को जानकर उन्हें नमन करें। शिव महाकाल हैं। औघड दानी हैं। भोले शंकर हैं। महामृत्युंञ्जयहैं। सर्वशक्तिमान हैं। वे देव हैं, देवाधिपतिहैं, हर हर महादेव हैं। महायोगीहैं। नटराज हैं। तीन आंख वाले हैं, क्रोधी हैं, तो अतिशीघ्र प्रसन्न भी होते हैं, अजन्मा हैं, सदा से हैं। मनुष्य रूप हैं, अरूप भी हैं। गंगा उनकी जटाओं से निकली हैं, सांप उनके गले में है, जो योग का कमाल है।
यहां गले में सांप के साथ विष भी है। देवासुर संग्राम में समुद्र मंथन से निकला विष उन्होंने ही पी लिया। वे विषपायीभी हैं। वे संहारक त्रिशूल रखते हैं, लेकिन गायन वादन के लिए डमरू भी है। वे परम ज्ञानी हैं। वे महा-नर्तक भी हैं। वे निराले देव हैं। वे भारत के महादेव, देवाधिपति शिवशंकर हैं। वे भारत की देवत्रयी ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से एक अतिमहत्वपूर्ण विराट दिव्य ऊर्जा हैं। शिव विश्व आस्था हैं।
भारत, मिस्र,यूनान, इटली, फ्रांस, अमेरिका आदि अनेक देशों में शिव की उपासना की जाती है। इस्लाम आने के पूर्व काबा क्षेत्र में शिव की 360 मूर्तियां थीं। इनमें शिव लिंग भी था। शिव समूचे भारत में मूर्ति के रूप में पूजे जाते हैं। भौतिक जगत की प्रत्येक वस्तु क्षरणशील है - क्षर है। यह इंद्रिय गोचर रूप-आकार है। उसमें विद्यमान अक्षर आत्मानुभूति का विषय है।
भारत में प्रत्येक व्यक्ति, कीट पतंगे, वनस्पति और अणु-परमाणु में भी परम ऊर्जा के तत्व देखे जाते हैं। जहां-जहां दिव्यता वहां-वहां देवता-यही भारतीय संस्कृति की अनुभूति है। ऋग्वेद में एक दिलचस्प देवता हैं रुद्र। वे तीन मुंह वाले हैं। वे साधकों का पोषण करते हैं तथा उन्हें मोक्ष भी दिलाते हैं। यही रुद्र भारत में लोकप्रिय महादेव हैं। रुद्र ऋग्वेद में ही शिव भी हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के सूक्त 114 में 11मंत्र हैं। सभी मंत्र रुद्र देव को अर्पित हैं। रुद्र यहां जटाधारी हैं। वे अपने हाथ में दिव्य आरोग्यदायी औषधियां रखते हैं। स्तुतिकत्र्ताओंको मानसिक शांति देते हैं। मनुष्य शरीर में मौजूद विष दूर करते हैं। मंत्र [1-6] में प्रार्थना है कि वृद्धों को न सताएं, बच्चों को हिंसा में न लगाएं। माता-पिता की हिंसा न करें। गौओंको आघात न पहुंचाएं। मंत्र [7-8] में वे मरुद्गणोंके पिता कहे गए हैं। सुरक्षा के लिए उनकी स्तुतियां की जाती हैं। मंत्र [9-11] ऋषिगण रुद्र का निवास पर्वत की गुहा में बताते हैं, उन्हें नमस्कार करते हैं।
चौथे मंत्र में वे रुद्र को शिवेन वचसा कहते हैं, अर्थात शिव हैं। पांचवें में वे प्रमुख प्रवक्ता, प्रथम पूज्य हैं। वे नीलकंठ हैं। [मंत्र 8]फिर वे सभा रूप हैं, सभापति भी हैं। [मंत्र 24]सेना और सेनापति भी हैं। [मंत्र 25]वे सृष्टि रचना के आदि में प्रथम पूर्वज हैं और वर्तमान में भी विद्यमान हैं। वे ग्राम गली में विद्यमान हैं, राजमार्ग में भी। वायु प्रवाह, प्रलय वास्तु सूर्य चंद्र में भी वे उपस्थित हैं [मंत्र 37-39]।मंत्र 64,65 व 66 में अंतरिक्ष व पृथ्वी में स्थित रुद्र को नमस्कार किया गया है। रुद्र और शिव एक हैं। उनकी हजार आंखें और भुजाएं हैं। वे योगी हैं। अथर्ववेद के 11वें अध्याय का दूसरा सूक्त रुद्र सूक्त कहा जाता है। रुद्र यहां भव [उत्पत्ति] हैं। [मंत्र 3]के अनुसार, वे अंतरिक्षमंडल के नियन्ता हैं, इसलिए उनको नमस्कार है। [मंत्र 4 मंत्र 5]में वे समदर्शी अर्थात सभी को एकसमान रूप में देखते हैं।
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बाल गोपाल

गोपाल

आँखों में गोपाल

दिल में नंदलाल

किधर देखू प्रभु

जहाँ भी देखूं

बस मेरे बाल गोपाल 

Thursday, July 26, 2012

अम्बे

माँ

भगवती भक्ति करो परवान तुम
अम्बे कर दो अमर जिस पर हो जाओ
मेहरबान तुम
दया दृष्टि बनाये  रखना
दुष्टों से बचाए रखना 

ननद किशोर

गोपाल

माखन चोर
नन्द किशोर
मनमोहन
घनश्याम रे
कितने तेरे रूप रे
कितने तेरे नाम रे 

भोले हैं

शिव

कर ले शिव की पूजा

पल मिलेगा न दूजा

भोले हैं शिव बड़े

नादानी से नाम

चले आयेंगे दौड़े 

विघ्न हरता

गणपति

विघ्न हरता
मंगल करता
गणपति बाप्पा
कृपा करता